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Benefits of Reading Shani Chalisa

What is Shanidev ?

Shanidev is said to be the planet of judgement and intense observation, hence also called Nyayadhish i.e a judge who looks after the jurisdiction of this universe in astrology and numerology.

Is Shani good or bad?

Just as Lord Yam is said to be the God of Death, similarly Shanidev is said to be the God of Karma who looks after your Karmafal, no matter whether it is Karma of the past or present times.  

Shani is neither good nor bad. He is the best judge of this cosmos. Thus, we should be careful while performing our karmas on thought (mind), words (conversation) and deeds (actions).

What is Shani Dev Mantra?

According to some ancient text and astrological scriptures, there are many mantras for Shani Dev, but the best among them and which is also a famous mantra to please Shani dev is –

Om Praam Preem Proum Saha Shanaischaraya Namah: II

How can i satisfy Shani Dev through Shani Chalisa

There are many ways wherein one can satisfy Shanidev, which are listed below:

  1. Every Saturday, go for Shani Dev darshan and offer him mustard oil and sesame seeds and chant the above-mentioned Shani mantra at least 108 times.
  2. Donate black coloured material like black shoes, umbrellas, clothes etc.
  3. One can also chant Shani Chalisa every day and especially chant Shani Chalisa 11 times every Saturday in front of Shani Idol in the Shani temple. 
  4. One can also keep the fast for Shani Dev every Saturday. 
  5. During the Fast, you should eat only one satvik meal (vegetarian diet without oily and spicy) and that too without salt.

Please note that for those patients who are suffering from High or Low Blood Pressure, they should consult their medical doctor and take diet/salt as per the medical expert.

One should not take Shanidev rituals or Shani Chalisa for testing or fun, else it will give you dire consequences. 

For my ardent followers and readers, I hereby advise you all to chant Shani Chalisa at least once daily, even if you don’t have any obstacles or Sade Sati, one should regularly chant Shani Chalisa.

There are many rituals and mantras for Sade Sati, which I will publish soon but meanwhile, you are advised to chant Shani Mantra and Shani Chalisa and see the results.

Note – For those devotees who are unable to read the Devanagari script in Shani Chalisa they can even read the deeper meaning of Shani Chalisa which will also yield the same results as reading Shani Chalisa.

Shree Shani Chalisa in Hindi श्री शनि चालीसा 

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

भावार्थ – हे पार्वती पुत्र गणपति ! आपकी जय हो । आप मंगल ताता और करुणा के सागर हो । हे नाथ, दीन दुखियों के दुख दूर करो और सदा आपका आशीर्वाद हम पर बना रहे । 

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

भावार्थ – हे शनिदेव प्रभु आपकी जय हो । हे सूर्यपुत्र! आप मेरी बिनती सुन लीजिए और कृपया करके हमारी लाज रखिए, मेरी रक्षा करें । 

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

भावार्थ  – हे दया के सागर ! हे शनिदेव ! आपकी जय हो जय हो, आप सभी भक्तों के पालन करता हो ।

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

भावार्थ – हे शनिदेव ! हाथ की चार भुजाएं हैं, आपका शरीर सुशोभित और शाम वर्ण है । आपके माथे पर रत्ना जड़ित मुकुट सुशोभित हो रहा है ।

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

भावार्थ – हे शनिदेव ! आपका ललाट ( भाला ) विशाल है जो हमारे मन को मोहित कर देता है । आपकी दृस्टि वृक्री है और आंखों की भोहे विकराल है ।

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

भावार्थ – आपके कानों में कुंडल चमक रहे हैं और आपकी वक्षस्थल में माणिक और मोतियों की माला बहुत ही अति सुंदर और सुशोभित लग रही है ।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

भावार्थ – प्रभु आपके हाथों में गदा त्रिशूल और कुंठारा सुशोभित हो रहे हैं और आप क्षण मात्र में शत्रुओं का संहार करने में समर्थ हो ।

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

भावार्थ – हे शनिदेव ! आप, दुखों के विनाश करने वाले पिंगल, कृष्ण, छाया नंदन, यम, कोणस्थ और रुद्रा, सौरी, मंद, शनि, और सूर्यपुत्र यह सब आपके 10 नाम है । इन 10 नामों का नित्य जाप करने से सर्व मनोकामनाएं पूरी होती हैं ।

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

भावार्थ – हे शनिदेव ! आप जिस मनुष्य या भक्त पर प्रसन्न हो जाते हो, वह चाहे रंक हो वह भी क्षण मात्र में राजा बन जाता है ।

पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

भावार्थ – हे शनिदेव ! आपकी दृष्टि पढ़ते ही पर्वत चूर चूर हो जाते है और यदि आप इच्छा मात्र से केवल माटी का एक छोटा सा कण भी पर्वत बन जाता है ।

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥


भावार्थ – जब भगवान श्री रामचंद्र जी का राज्याभिषेक होने वाला था तभी आप ही ने माता कैकेयी की मती को भ्रष्ट कर दिया और प्रभु श्री राम जी को वनवास में पहुंचा दिया ।

बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

भावार्थ – आपने वन में स्वर्ण मृग ( हिरण ) का निर्माण किया जो सीता माता का अपहरण का मुख्य कारण बना ।

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥

भावार्थ – श्री शनिदेव ! आपके ही शक्ति प्रहार से फिर लक्ष्मण जी व्यथित हो गए जिसके कारण भगवान श्री रामचंद्र जी की सेना में चिंता की लहर दौड़ पड़ी ।

रावण की गति-मति बौराई। रामचंद्र सों बैर बढ़ाई॥

भावार्थ – आपने ही रावण जैसे महापंडित का बुद्धि भ्रष्ट कर दी जिसके कारण रावण जैसे महापंडित भी विष्णु अवतार भगवान श्री रामचंद्र जी के साथ वैर भाव उत्पन्न हुआ ।

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

भावार्थ – आपने ही रावण की सोने की लंका को पल भर मात्रा में चकनाचूर कर दिया और श्री राम भक्त- हनुमान जी का गौरव में वृद्धि कर दी ।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

भावार्थ – राजा वीर विक्रमादित्य जब आपकी दृष्टि गई तो दीवार पर अंकित मोर रानी का हार अदृश्य हो गया ।

हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

भावार्थ – नौलखा हार की चोरी का आरोप राजा विक्रमादित्य पर आरोपित किया गया जिसके कारण उनके हाथ पैर कटवाने पड़े ।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

भावार्थ – राजा विक्रमादित्य की इतनी दयनीय हालत हो गई जिसमें उनको एक तेली के घर पर नौकरी करनी पड़ी, जिसमें उन्होंने बैल का कार्य किया ।

विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

भावार्थ – जब राजा विक्रमादित्य ने दीपक राग में आपसे प्रार्थना की तब आप अति प्रसन्न होकर राजा को पुनः सुख प्रदान किया ।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥

भावार्थ – आपकी कुपित दृष्टि जब राजा हरिश्चंद्र के ऊपर पड़ी, तब उनको अपनी धर्मपत्नी को बेचना पड़ा और एक शुद्र के घर पर पानी भरने का कार्य करना पड़ा ।

तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

भावार्थ – आपकी वक्र दृष्टि जब राजा नल के ऊपर पड़ी, तब उनके भोजन पात्रों में (पकवान में ) मछलियां भी जीवित होकर पानी में कूद पड़ी ।

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥

भावार्थ – भगवान शंकर पर जब आपकी वक्र दृष्टि गयी तब उनकी धर्मपत्नी माता पार्वती को भी हवन कुंड में भस्म होना पड़ा।

तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

भावार्थ – गौरी नंदन भगवान श्री गणेश के ऊपर जब आपने अल्प क्रोध करके वक्र दृस्टि डाली तब उनका सिर धड़ से अलग होकर आकाश में उड़ने लगा ।

पांडव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥

भावार्थ – महाभारत काल में जब आप की दृष्टि पांडवों पर गई तब राज्यसभा में सती द्रौपदी का चीर हरण हुआ ।

कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥

भावार्थ – अपने ही कौरव के बुद्धि को हरण कर लिया था जिसके कारण वे लोग अपनी विवेक शक्ति समाप्त कर चुके थे अतः महाभारत युद्ध प्रारंभ हुआ ।

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥

भावार्थ – तत्काल आपने भगवान श्री सूर्य देव को अपने मुख में स्थापित करके पाताल लोक में चले गए ।

शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

भावार्थ – जब सारे देवी देवताओं ने आपसे विनय प्रार्थना की तब आपने भगवान सूर्यदेव को मुक्त किया ।

वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥ 

भावार्थ – आप सात प्रकार के वाहन – घोड़े हिरण, कुत्ता , गधा, लोमड़ी और वाघ है । 

जंबुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

भावार्थ – यह हम सभी जानते हैं कि यह सभी प्रकार के वाहन के फल प्रत्येक ज्योतिषियों ने अलग-अलग बताए है ।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥

भावार्थ – हे भगवान शनि देव ! जब आप हाथी के ऊपर आरूढ़ ( बैठे हो ) होते हैं, घर में संपत्ति प्राप्त होती है । जब आप घोड़े के ऊपर सवारी करते हैं तब घर में सुख संपत्ति की वृद्धि होती है । 

गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

भावार्थ – जब आप गधे के ऊपर सवारी करते हो तब मनुष्य को नुकसान प्राप्त होता है उसके सारे बने हुए काम बिगड़ जाते हैं । हे प्रभु जब आप सिंह के ऊपर आरूढ़ ( बैठे हो ) होते हैं, तब समाज में कीर्ति प्राप्त होती है ।

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

भावार्थ – हे भगवान शनि देव ! जब आप लोमड़ी के ऊपर आरूढ़ ( बैठे हो ) होते हैं । 

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

भावार्थ – हे भगवान शनि देव ! जब आप कुत्ते के ऊपर आरूढ़ ( बैठे हो ) होते हैं तब चोरी होती है और भय व्याप्त हो जाता है ।

तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चांदी अरु तामा॥

भावार्थ – हे भगवान शनि देव ! ऐसी ही दशा सोना चांदी लोखंड और तांबा आदि धातुओं की होती है ।

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

भावार्थ – हे भगवान शनि देव ! जब आपके पैर लोहा (लोखंड) धातु के ऊपर स्थापित होते हैं तब धन और संपत्ति आदि सर्वदा नाश हो जाते हैं ।

समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥

भावार्थ – हे भगवान शनि देव ! मामा और चांदी के धातुओं के ऊपर जब आप के पवित्र पैर स्थापित हो जाते हैं तो वह शुभकारी माने जाते हैं और जब स्वर्ण धातु के ऊपर आपके पवित्र पैरों का स्पर्श होता है तो सुख प्रदान होता है और साथ-साथ मनुष्य को मंगलकारी बनाते हैं ।

जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

भावार्थ – इस शनि चरित्र का जो नित्य पाठ करता है उस साधक या साधिका पर कभी भी बुरी दशा का प्रभाव व्याप्त नहीं होता ।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

भावार्थ – हे प्रभु ! पीड़ित करने वाले इन अद्भुत लीलाओं को आप सभी मनुष्यों को दिखलाती हो और साथ ही साथ शत्रुओं का बल को विनाश करते हो ।

जो पंडित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

भावार्थ – यदि यजमान,योग्य पंडित या विद्वान को अपने घर पर बुलाकर भगवान शनिदेव की ग्रह शांति का पूजन करवाता है ।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥

भावार्थ – शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष पर जल अर्पण करता है और सरसों के तेल में दीपदान करता है उसे अनेक प्रकार के सुख उपलब्ध होते हैं । 

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

भावार्थ – प्रभु के सेवक, श्री राम सुंदर जी का कहना है , जो भगवान शनिदेव का ध्यान करता है उसे सभी प्रकार का सुख प्राप्त होता है और सुख रुपी प्रकार चारों ओर व्याप्त हो जाता है ।

दोहा

पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

भावार्थ – भक्त प्रसाद ! इन्होने ,इस शनि चालीसा का अनुवाद किया है । जो भक्त श्रद्धा पूरक ४० दिन तक इसका ( शनि चालीसा ) का नियमपूरक पाठ करता है , वह भवसागर पार कर जाता है ।

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Regards,

Nirav Hiingu