Why We Celebrate Navratri ?

Why We Celebrate Navratri ?

In Indian month – Ashwin Shukla pakhya it is consider as Aswin Navratri which is celebrated not only in India but across the world. In ancient times Ashwin Navratri was consider as New Year in Hindus later Chaitra Mass – Shukla Pakhya Pratipada – mean 1st day of Chaitra month was also consider and celebrated as New Year.

Now a question arise as why Navratri is consider so auspicious ? In Navratri Lord Rama – King of Aayodhya once keep fasting and worshiped Lord Durga – the Adishakti on eve of navratri .

When Lord Rama was struggling to fight and invade Shri Lankapati Shri Ravana , it seem to rama very tough to defeat him on both political and spiritual ground , hence on recommendation of his Guru,Lord Rama started devotion of Adi Shakti.

During the spiritual rites was going on , one day it was a procedure to offer 108 lotus to Maa Durga , hence Shri Rama started reciting mantras and offer lotus one –by-one . Ravana get to know the ritual through its Maya-shakti so he stole 1 lotus through his evil power. Thus when Shri Rama completed 107 mantras and offer 107 lotus , he found one lotus is missing.

He get surprised as how 1 lotus get missed. After thinking for movement he realized that people of Bharat ( previously India was known as Bharat Varsha ) called him “Kamalnayan” ( one who has Eyes like Lotus hence termed as Kamalnayan ) thus without thinking further he took one knife to cut his eye and when he was on a point to cut his eye ,Maa Durga get manifested in front of him and stop him from cutting his eye and asked him : What do you want ? I am extremely delighted on your devotion ,Upon this Lord Rama ask for blessing to defeat Shri Ravana in war .

On side when Ravana get to know about this incident ,he immediately call upon meeting of his scholars and Brahmin to take advise as how to beat Rama. Upon the advise of Brahmins ,Ravana started Laksha-Chandi Path ( recitation of 1 Lacs slokas of Chandi- Durgasapta Sathi ) and Yagya .

The ardent devotee of Shri Rama , Shri Hanuman when get to know that even Ravana is performing Lakhya Chandi Yagya with thousands of Scholars-Brahmins , he went to the spot in form of Brahmin and stated : Oh ! Great Brahmins , you re doing good job , I would like to tell you that if you recite one specific mantra in Durga Pooja , she will be happy and manifest herself at earlier. Upon this words Brahmin got eager and ask : What is that mantras ?

Hanuman : ‘Bhruti Karni ‘– hence Brahmins started reciting Bhrutu-Karni ( who create barrier in life) instead of Bhruti Harani ( one who removes obstacles/hindrances ), hence upon the continue recitation of such mantras , Maa Durga got angry on Ravana and manifest in front of Brahmins and Ravana and curse him that his whole family and generation will be destroyed sooner.

Later Shri Rama started war on auspicious day of Navratri and on 10th day of Navratri ,Shri Ravana was killed in war against Shri Ravana.

Swar Vigyan – स्वर-विज्ञान

स्वर-विज्ञान का ज्ञान
परिचय

 

 

जिस तरह वायु का बाहरी उपयोग है वैसे ही उसका आंतरिक और सूक्ष्म उपयोग भी है। जिसके विषय में जानकर कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति आध्यात्मिक तथा सांसरिक सुख और आनंद प्राप्त कर सकता है। प्राणायाम की ही तरह स्वर विज्ञान भी वायुतत्व के सूक्ष्म उपयोग का विज्ञान है जिसके द्वारा हम बहुत से रोगों से अपने आपको बचाकर रख सकते हैं और रोगी होने पर स्वर-साधना की मदद से उन रोगों का उन्मूलन भी कर सकते हैं। स्वर साधना या स्वरोदय विज्ञान को योग का ही एक अंग मानना चाहिए।

ये मनुष्य को हर समय अच्छा फल देने वाला होता है, लेकिन ये स्वर शास्त्र जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल है इसको सिखाने वाला गुरू मिलना। स्वर साधना का आधार सांस लेना और सांस को बाहर छोड़ने की गति स्वरोदय विज्ञान है। हमारी सारी चेष्टाएं तथा तज्जन्य फायदा-नुकसान, सुख-दुख आदि सारे शारीरिक और मानसिक सुख तथा मुश्किलें आश्चर्यमयी सांस लेने और सांस छोड़ने की गति से ही प्रभावित है। जिसकी मदद से दुखों को दूर किया जा सकता है और अपनी इच्छा का फल पाया जाता है।

प्रकृति का ये नियम है कि हमारे शरीर में दिन-रात तेज गति से सांस लेना और सांस छोड़ना एक ही समय में नाक के दोनो छिद्रों से साधारणत: नही चलता। बल्कि वो बारी-बारी से एक निश्चित समय तक अलग-अलग नाक के छिद्रों से चलता है। एक नाक के छिद्र का निश्चित समय पूरा हो जाने पर उससे सांस लेना और सांस छोड़ना बंद हो जाता है और नाक के दूसरे छिद्र से चलना शुरू हो जाता है। सांस का आना जाना जब एक नाक के छिद्र से बंद होता है और दूसरे से शुरू होता है तो उसको `स्वरोदय´ कहा जाता है। हर नथुने में स्वरोदय होने के बाद वो साधारणतया 1 घंटे तक मौजूद रहता है। इसके बाद दूसरे नाक के छिद्र से सांस चलना शुरू होता है और वो भी 1 घंटे तक रहता है। ये क्रम रात और दिन चलता रहता है।

जब नाक से बाएं छिद्र से सांस चलती है तब उसे `इड़ा´ में चलना अथवा `चंद्रस्वर´ का चलना कहा जाता है और दाहिने नाक से सांस चलती है तो उसे `पिंगला´ में चलना अथवा `सूर्य स्वर´ का चलना कहते हैं और स्वर मुख्यत: 3 प्रकार के होते हैं ।

चंद्रस्वर

जब नाक के बाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसको चंद्रस्वर कहा जाता है। ये शरीर को ठंडक पहुंचाता है। इस स्वर में तरल पदार्थ पीने चाहिए और ज्यादा मेहनत का काम नही करना चाहिए।

सूर्यस्वर

जब नाक के दाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसे सूर्य स्वर कहा जाता है। ये स्वर शरीर को गर्मी देता है। इस स्वर में भोजन और ज्यादा मेहनत वाले काम करने चाहिए।

सुषुम्नास्वर

नाक के दोनो छिद्रों से जब एक ही समय में बराबर सांस चलती है तब उसको `सुषुम्ना में चलना कहा जाता है। योग के मुताबिक सांस को ही स्वर कहा गया है।

स्वर बदलने की विधि

नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चल रहा हो तो उसे दबाकर बंद करने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से स्वर चल रहा हो उसी तरफ करवट लेकर लेटने से दूसरा स्वर चलने लगता है।

नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चलाना हो उससे दूसरी तरफ के छिद्र को रुई से बंद कर देना चाहिए।
ज्यादा मेहनत करने से, दौड़ने से और प्राणायाम आदि करने से स्वर बदल जाता है। नाड़ी शोधन प्राणायाम करने से स्वर पर काबू हो जाता है। इससे सर्दियों में सर्दी कम लगती है और गर्मियों में गर्मी भी कम लगती है।

स्वर ज्ञान से लाभ

जो व्यक्ति स्वर को बार-बार बदलना पूरी तरह से सीख जाता है उसे जल्दी बुढ़ापा नही आता और वो लंबी उम्र भी जीता है। कोई भी रोग होने पर जो स्वर चलता हो उसे बदलने से जल्दी लाभ होता है।

शरीर में थकान होने पर चंद्रस्वर (दाईं करवट) लेटने से थकान दूर हो जाती है। स्नायु रोग के कारण अगर शरीर मे किसी भी तरह का दर्द हो तो स्वर को बदलने से दर्द दूर हो जाता है।

दमे का दौरा पड़ने पर स्वर बदलने से दमे का दौरा कम हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिन में बायां और रात में दायां स्वर चलता है वो हमेशा स्वस्थ रहता है। गर्भधारण के समय अगर पुरुष का दायां स्वर और स्त्री का बायां स्वर चले तो उस समय में गर्भधारण करने से निश्चय ही पुत्र पैदा होता है। प्रकृति शरीर की जरूरत के मुताबिक स्वरों को बदलती रहती है। अगर जरूरत हो तो स्वर बदला भी जा सकता है।

वाम स्वर – परिचय

जिस समय व्यक्ति का बाईं तरफ का स्वर चलता हो उस समय स्थिर, सौम्य और शांति वाला काम करने से वो काम पूरा हो जाता है जैसे- दोस्ती करना, भगवान के भजन करना, सजना-संवरना, किसी रोग की चिकित्सा शुरू करना, शादी करना, दान देना, हवन-यज्ञ करना, मकान आदि बनवाना शुरू करना, किसी यात्रा की शुरूआत करना, नई फसल के बीज बोना, पढ़ाई शुरू करना आदि।

दक्षिण स्वर – परिचय

जिस समय व्यक्ति का दाईं तरफ का स्वर चल रहा हो उस समय उसे काफी मुश्किल, गुस्से वाले और रुद्र कामों को करना चाहिए जैसे- किसी चीज की सवारी करना, लड़ाई में जाना, व्यायाम करना, पहाड़ पर चढ़ना, स्नान करना और भोजन करना आदि।

सुषुम्ना – परिचय

जिस समय नाक के दोनों छिद्रों से बराबर स्वर चलते हो तो इसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं। उस समय मुक्त फल देने वाले कामों को करने से सिद्धि जल्दी मिल जाती है जैसे- धर्म वाले काम में भगवान का ध्यान लगाना तथा योग-साधना आदि करने चाहिए।

विशेष

जो काम `चंद्र और `सूर्य´ नाड़ी में करने चाहिए उन्हे `सुषुम्ना´ के समय बिल्कुल भी न करें नही तो इसका उल्टा असर पड़ता है।

स्वर चलने का ज्ञान

अगर कोई व्यक्ति जानना चाहता है कि किस समय कौन सा स्वर चल रहा है तो इसको जानने का तरीका बहुत आसान है। सबसे पहले नाक के एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। फिर इस छिद्र को बंद करके उसी तरह से दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। नाक के जिस छिद्र से सांस लेने और छोड़ने में आसानी लग रही हो समझना चाहिए कि उस तरफ का स्वर चल रहा है और जिस तरफ से सांस लेने और छोड़ने मे परेशानी हो उसे बंद समझना चाहिए।

इच्छा के मुताबिक सांस की गति बदलना

अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से अपनी सांस की चलने की गति को बदलना चाहता है तो इसकी 3 विधियां है ।

सांस की गति बदलने की विधि

नाक के जिस तरफ के छेद से सांस चल रही हो, उसके दूसरी तरफ के नाक के छिद्र को अंगूठे से दबाकर रखना चाहिए तथा जिस तरफ से सांस चल रही हो वहां से हवा को अंदर खींचना चाहिए। फिर उस तरफ के छिद्र को दबाकर नाक के दूसरे छिद्र से हवा को बाहर निकालना चाहिए। कुछ देर तक इसी तरह से नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने से सांस की गति जरूर बदल जाती है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से सांस चल रही हो उसी करवट सोकर नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से छोड़ने की क्रिया को करने से सांस की गति जल्दी बदल जाती है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो सिर्फ उसी करवट थोड़ी देर तक लेटने से भी सांस के चलने की गति बदल जाती है।

प्राणवायु को सुषुम्ना में संचारित करने की विधि 

प्राणवायु को सुषुम्ना नाड़ी में जमा करने के लिए सबसे पहले नाक के किसी भी एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से सांस लेने की क्रिया करें और फिर तुरंत ही बंद छिद्र को खोलकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर निकाल दीजिए। इसके बाद नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस छोड़ी हो, उसी से सांस लेकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर छोड़िये। इस तरह नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने और फिर दूसरे से सांस लेकर पहले से छोड़ने से लगभग 50 बार में प्राणवायु का संचार `सुषुम्ना´ नाड़ी में जरूर हो जाएगा।

स्वर साधना का पांचो तत्वों से सम्बंध

हमारे शरीर को बनाने में जो पांच तत्व (आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल) होते हैं उनमें से कोई ना कोई तत्व हर समय स्वर के साथ मौजूद रहता है। जब तक स्वर नाक के एक छिद्र से चलता रहता है, तब तक पांचो तत्व 1-1 बार उदय होकर अपने-अपने समय तक मौजूद रहने के बाद वापिस चले जाते हैं।

स्वर के साथ तत्वों का ज्ञान

स्वर के साथ कौन सा तत्व मौजूद होता है, ये किस तरह कैसे जाना जाए पंचतत्वों का उदय स्वर के उदय के साथ कैसे होता है और उन्हे कैसे जाना जा सकता है। इसके बहुत से उपाय है, लेकिन ये तरीके इतने ज्यादा बारीक और मुश्किल होते हैं कि कोई भी आम व्यक्ति बिना अभ्यास के उन्हे नही जान सकता।

नाक के छिद्र से चलती हुई सांस की ऊपर नीचे तिरछे बीच में घूम-घूमकर बदलती हुई गति से किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है।

हर तत्व का अपना एक खास आकार होता है। इसलिए निर्मल दर्पण पर सांस को छोड़ने से जो आकृति बनती है उस आकृति को देखकर उस समय जो तत्व मौजूद होता है, उसका पता चल जाता है।
शरीर में स्थित अलग-अलग चक्रों द्वारा किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जाता है।
हर तत्व का अपना-अपना एक खास रंग होता है। इससे भी तत्वों के बारे में पता लगाया जा सकता है।

हर तत्व का अपना एक अलग स्वाद होता है। उसके द्वारा भी पता लगाया जा सकता है। सुबह के समय तत्व के क्रम द्वारा नाक के जिस छिद्र से सांस चलती हो उसमे साधारणत: पहले वायु, फिर अग्नि, फिर पृथ्वी इसके बाद पानी और अंत में आकाश का क्रमश: 8, 12, 20, 16 और 4 मिनट तक उदय होता है।

तत्वों के परिमाण द्वारा भी किसी तत्व की स्वर के साथ मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। इसका तरीका ये है कि बारीक हल्की रुई लेकर उसे जिस नाक के छिद्र से सांस चल रही हो, उसके पास धीरे-धीरे ले जाइए। जहां पर पहले-पहले रुई हवा की गति से हिलने लगे वहां पर रुक जाए और उस दूरी को नाप लीजिए। यदि वो दूरी कम से कम 12 उंगली की निकले तो पृथ्वी तत्व 16 अंगुल है, जल तत्व 4 अंगुल है, अग्नि तत्व 8 अंगुल है और वायु तत्व 20 अंगुल है तो आकाश तत्व की मौजूदगी समझनी चाहिए।

स्वर साधना के चमत्कार और उससे स्वास्थ्य की प्राप्ति

असल जिंदगी मे स्वर की महिमा बहुत ही ज्यादा चमत्कारिक है। इसके कुछ सरल प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं। सुबह उठने पर पलंग पर ही आंख खुलते ही जो स्वर चल रहा हो उस ओर के हाथ की हथेली को देखें और उसे चेहरे पर फेरते हुए भगवान का नाम लें। इसके बाद जिस ओर का स्वर चल रहा हो उसी ओर का पैर पहले बिस्तर से नीचे जमीन पर रखें। इस क्रिया को करने से पूरा दिन सुख और चैन से बीतेगा।
अगर किसी व्यक्ति को कोई रोग हो जाए तो उसके लक्षण पता चलते ही जो स्वर चलता हो उसको तुरंत ही बंद कर देना चाहिए और जितनी देर या जितने दिनो तक शरीर स्वस्थ न हो जाए उतनी देर या उतने दिनो तक उस स्वर को बंद कर देना चाहिए। इससे शरीर जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है और रोगी को ज्यादा दिनों तक कष्ट नही सहना पड़ता।

अगर शरीर में किसी भी तरह की थकावट महसूस हो तो दाहिने करवट सो जाना चाहिए, जिससे `चंद्र´ स्वर चालू हो जाता है और थोड़े ही समय में शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है। स्नायु रोग के कारण अगर शरीर के किसी भाग में किसी भी तरह का दर्द हो तो दर्द के शुरू होते ही जो स्वर चलता हो, उसे बंद कर देना चाहिए। इस प्रयोग को सिर्फ 2-4 मिनट तक ही करने से रोगी का दर्द चला जाता है।

जब किसी व्यक्ति को दमे का दौरा पड़ता है उस समय जो स्वर चलता हो उसे बंद करके दूसरा स्वर चला देना चाहिए। इससे 10-15 मिनट में ही दमे का दौरा शांत हो जाता है। रोजाना इसी तरह से करने से एक महीने में ही दमे के दौरे का रोग कम हो जाता है। दिन में जितनी भी बार यह क्रिया की जाती है, उतनी ही जल्दी दमे का दौरा कम हो जाता है।

जिस व्यक्ति का स्वर दिन में बायां और रात मे दायां चलता है, उसके शरीर में किसी भी तरह का दर्द नही होता है। इसी क्रम से 10-15 दिन तक स्वरों को चलाने का अभ्यास करने से स्वर खुद ही उपर्युक्त नियम से चलने लगता है।

रात को गर्भाधान के समय स्त्री का बांया स्वर और पुरुष का अगर दायां स्वर चले तो उनके घर में बेटा पैदा होता है तथा स्त्री-पुरुष के उस समय में बराबर स्वर चलते रहने से गर्भ ठहरता नही है।
जिस समय दायां स्वर चल रहा हो उस समय भोजन करना लाभकारी होता है। भोजन करने के बाद भी 10 मिनट तक दायां स्वर ही चलना चाहिए। इसलिए भोजन करने के बाद बायीं करवट सोने को कहा जाता है ताकि दायां स्वर चलता रहे। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है और व्यक्ति को कब्ज का रोग भी नही होता। अगर कब्ज होता भी है तो वो भी जल्दी दूर हो जाता है।

किसी जगह पर आग लगने पर जिस ओर आग की गति हो उस दिशा में खड़े होकर जो स्वर चलता हो, उससे वायु को खींचकर नाक से पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से या तो आग बुझ जाएगी या उसका बढ़ना रुक जाएगा ।

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मयूरेश स्तोत्रं -Lord Mayuresh Stotram

                             मयूरेश स्तोत्रं -Mayuresh Stotram

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Lord Brahma – said

पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा । मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ १ ॥

Puran-purusham Devam nan kridakaram munda l Mayavinam Durvibhayam Mayuresh Namayaham ll 1 ll

One who  is divine personality , create different creations and administer the whole universe , who is above the illusion ( Maha-maya ) and master of illusion, those form is unspeakable , i salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् । गुणातीतं गुनमयं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ २ ॥

Paratpar Chidanandam Nirvikaram hradi thitham l Gunathitam Gunamayam Mayuresham Namayaham ll 2 ll

One who is best among all demigods,superior ,who is deep seated in lotus heart of every human beings , those strengths and skills can’t counted, extremely talented , i salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ३ ॥

Sujantam Palayatham cha Sanharatham Nichedaya l Sarva-Vidhna-haram devam Mayuresham Namayaham ll 3 ll

One who has created this whole Universe , administer and destroy by its own will , who remove all obstacles in life ,i salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

नानादैत्यनिहन्तारं नानारुपाणि बिभ्रतम् ।नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ४ ॥

Nandetya Nihantaaram Nanaroopani Bibhtatham l Nanayudha-dharam Bhatya Mayuresham Namayaham ll 4 ll

One who destroy all evils force and substance in life , who can create numerous form of self in universe , those demigod who wear different astra-shastra ( weapons ) , i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् ।सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ५ ॥

Indradi-devta Vrunder-bhisthu Mahanisham l Sad-asad Vkrata-Ma-Akratam Mayuresham Namayaham ll 5 ll

Lord Indra ( kings of demigods) and other demigods who always worship day and night , one who is above truth and untruth , who is speakable and unspeakable , i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरुपधरं विभुम् । सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ६ ॥

Sarva-shaktimayam Devam Savraroop dharam Vibhum l Sarvavidya pravataram Mayuresham Namayaham ll 6 ll

One who is extremely powerful , beautiful , best in intellectuality , i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् । भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ७ ॥

Parvati-nandanam Shambhora-Nanda-Parivardhanam l Bhaktanand karam nityam Mayuresham Namayaham ll 7 ll

He is the son of Goddess Parvati , who create divine smile and delightness to Lord Shiva and who create daily happiness all of his devotees,i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

 

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मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपुरकम् ।समष्टिव्यष्टिरुपं त्वां मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ८ ॥

Muni-dheyam Muni-nutam Munikaam-Prapurakam l Samrith -Vayreth roopam Tham Mayuresham Namayaham ll 8 ll

One to whom all Monks meditate upon , to whom all spiritual seeker glorify and chant his names,who fulfill wishes of devotees , who is form and formless , i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ ९ ॥

Sarva gyan- Nihantaram Sarva Gyan karam Shuchim l Satyagyan mayam satyaam Mayuresham Namayaham ll 9 ll

With whom all knowledge get disburse,who destroy the ignorance , One from whom all knowledge arise ,who is pious,truth and with whom the truth prevails, i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्र्वरम् । अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमामा्यहम् ॥ १० ॥

Anek koti Brahmand Nayak Jagadishwaram l Anant-Vibhavam Vishnum Mayuresham Namayaham ll 10 ll

One who is Master of billions of galaxies,who is said to be Ultimate Supreme ,who is known to have numerous wealth and luxury and who is said to be Vishnu-swaroop – Almighty form of Administrator,i  salute to such Godhead Supreme Lord Ganesha Mayuresh.

Lord Mayuresha said :

इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् । सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ ११  ॥

Idam Brahma-karam Stotram Sarva-paap Nashanaham l Sarvakaam Pradam Nunaam Sarvo-Pra-dravya-naashanam ll 11 ll

One who recite this verse , will attain Brahma-Bhava – attaining higher state of consciousness and destroy all the past life karma ( sins ), If one recite this verse daily then his all goal is achieved and hurdles in life is ended by blessings of Lord Ganesha.

कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् ।आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥ १२॥

Karagraha Gataanaam cha Mochanam Din Saptakaath l Aadi-Wyadi haram chevya Bhukti Mukti pardam Shubham ll 12 ll

One who recite this mayuresh stotram 7 times a day then such devotee will get rids of imprisonment by blessing of lord ganesha and this stotram help in getting rids of physical and mental ailments.

 ॥ इति श्रीमयूरेशस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

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Sadguru -Spiritual Master

INDIA is the fertile land of vast knowledge and culture . On the river bank of Sindhu ( later sindhu river called as HINDU due to wrong pronunciation hence people residing near river were called as HINDU) the indian rishis recited VEDA Mantras and compose the scared scriptures,Viz 4 vedas- Rigvedas, Yajurvedas,Samvedas and Atharvedas, 18 Puranas , Darshana , Mimamsha , Yog but later on laymen were unable to understand this highly based spiritual scripts thus indian rishi composed 108 Upanishada

Upanishada mean to come nearby to Spiritual Master. The spiritual master in Indian tradition known as Guru. Usually it is consider as highly elevated soul , more likely to be GODMEN and worshipped like almighty.

Guru is free from caste, race , gender and religion . Since guru cannot be classify in different categories ,scriptures further says that there are 2 types of guru .

1) GURU

2) SADGURU

Katho-Upanishada which is based on conversation between  Nachiketa ( son of King Udaalak) and Demigod Yama ( King of death) .This is wonderful scriptures which give answers on mystery of death and human suffering.This Upanishad says that there are 3 sign/ways wherein  common man can identify the spiritual master.

a) Sadguru is one who is get adjust to the situation , in other term he is extremely flexible to nature and mould himself according to situation.

If a devotee offer him food in royal palace with all luxuries in morning then he will happy .But same or other devotee offer him simple food in poor hut then also the Sadguru will be happy having no tense nor any attachment toward any materialistic things/world.

b) Second sign of Sadguru  is one who has vast complete knowledge of universe.He can speak on any topic without any prior preparation.He can speak on tradition , atom , science , human civilization  etc.

For him to speak on any subject of Universe is extremly easy.It is said that Lord Saraswati ( Demigod of Knowledge ) reside in tongue of such higher soul.

Now a question arise that even a POLITICIAN can speak nicely .But there is huge difference in between Guru and Politician, politician also speak very fluently but his/her word get sinked in human brain which is retain in human memory for a short period of time wherein words spoken by Guru get sink into human heart and left the big impact of human race forever.

c) Third sign of Sadguru is that he is a good companion of human being .One feel very comfortable and joyful as he/she sat down in feet of guru.Scriptures say real guru always take care of his/her disciple in every form , in critical time ,grief and also in happy movement .At every step the disciple feel like guru is his/her father,mother , brother and friends , guide and mentor.

HINDU scriptures say Guru is more like a Mentor , guide and helpful person throughout the life because GURU is only one person in UNIVERSE who take care of his disciple even after death or next life.

I was lucky enough to have met SADGURU and sat at his divine lotus feet .His presence make me such a joyful state which cannot express in words.

 

HAPPY GURU -POORNIMA